साहित्य जगत ने एक महान विभूति को खो दिया है। प्रख्यात बंगाली उपन्यासकार शंकर (जिनका मूल नाम मणि शंकर मुखोपाध्याय था) का 92 वर्ष की आयु में कोलकाता में निधन हो गया। उनके निधन से बंगाली साहित्य के एक ऐसे अध्याय का समापन हो गया, जिसने दशकों तक शहर के हृदय की धड़कनों को अपनी लेखनी में पिरोया।
कलकत्ता को आवाज़ देने वाली एक अद्वितीय विरासत
उपन्यासकार शंकर एक ऐसे लेखक थे जिन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से कलकत्ता (अब कोलकाता) के अनसुने को सुनाया। उनकी रचनाएँ केवल कहानियाँ नहीं थीं, बल्कि शहर के उन अनगिनत श्रमिकों की गाथाएँ थीं जो अपनी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करते थे; उन स्वप्नद्रष्टाओं के अरमान थे जो अभावों के बीच भी बड़े सपने देखने का साहस रखते थे; और उन भूले-बिसरे कोनों की पहचान थीं, जहाँ शहर की असली आत्मा बसती थी। उन्होंने अपनी लेखनी से हाशिए पर पड़े लोगों, दैनिक जीवन की चुनौतियों और मानवीय भावनाओं की गहराई को जीवंत कर दिया।
उनके उपन्यास और लेख सिर्फ़ मनोरंजन के साधन नहीं थे, बल्कि वे समाज का दर्पण थे जो कलकत्ता के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को बारीकी से दर्शाते थे। शंकर ने अपनी कलम से शहर की विविधता, उसके संघर्ष और उसकी अदम्य भावना को अमर कर दिया। उनकी साहित्यिक विरासत आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देती रहेगी कि कैसे शब्दों के माध्यम से एक शहर की आत्मा को जीवंत किया जा सकता है।
हम उपन्यासकार शंकर को उनके अद्वितीय साहित्यिक योगदान और कलकत्ता के प्रति उनके गहरे प्रेम के लिए हमेशा याद रखेंगे। उनका जाना एक युग का अंत है, लेकिन उनकी रचनाएँ सदा अमर रहेंगी।


