इतिहास के पन्नों में कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जिनकी दूरदर्शिता आज भी हमें प्रेरित करती है। सम्राट अशोक उन्हीं में से एक थे। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि यदि उनकी ‘सार्वभौमिक दृष्टि’ (Ecumenical Vision) वास्तव में सफल हो जाती तो आज दुनिया कैसी होती?
पैट्रिक ओलिवेल की ‘अशोक: पोर्ट्रेट ऑफ़ अ फिलॉसॉफर किंग’
प्रसिद्ध विद्वान पैट्रिक ओलिवेल (Patrick Olivelle) अपनी नवीनतम पुस्तक ‘अशोक: पोर्ट्रेट ऑफ़ अ फिलॉसॉफर किंग’ में हमें इसी विचारोत्तेजक प्रश्न पर मनन करने के लिए आमंत्रित करते हैं। यह पुस्तक केवल सम्राट अशोक के जीवन का वर्णन नहीं करती, बल्कि हमें एक दार्शनिक राजा के रूप में उनकी कल्पनाओं और उनके ‘धम्म’ की शक्ति को समझने का अवसर भी देती है।
सम्राट अशोक और उनका धम्म
कलिंग युद्ध के भयावह परिणामों को देखने के बाद, सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ और उन्होंने युद्ध का मार्ग त्याग कर ‘धम्म’ (नैतिक मूल्यों और सार्वभौमिक सद्भाव का मार्ग) को अपनाया। उनका धम्म किसी विशेष धर्म का प्रचार नहीं था, बल्कि सहिष्णुता, अहिंसा, करुणा, सभी धर्मों के प्रति सम्मान और सामाजिक कल्याण पर आधारित एक जीवन शैली थी। उनका सपना एक ऐसे समाज का निर्माण करना था जहाँ सभी लोग शांति और सद्भाव से रह सकें, चाहे उनकी आस्था कुछ भी हो।
यदि अशोक की दृष्टि सफल होती तो…
ओलिवेल की पुस्तक हमें इसी “यदि ऐसा होता तो…” (What if?) परिदृश्य में ले जाती है।
- विश्व शांति: यदि अशोक की सार्वभौमिक शांति और अहिंसा की अवधारणा विश्व स्तर पर स्वीकार की जाती, तो शायद युद्धों का इतिहास बहुत अलग होता।
- धार्मिक सहिष्णुता: उनकी सभी धर्मों के प्रति सम्मान की नीति यदि व्यापक रूप से अपनाई जाती, तो शायद धार्मिक संघर्ष कम होते और सह-अस्तित्व की भावना मजबूत होती।
- नैतिक शासन: अशोक का धम्म शासन का आधार होता, जिसमें शासक जनता के कल्याण और नैतिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते।
- सांस्कृतिक समृद्धि: विभिन्न संस्कृतियाँ और विचार बिना किसी भय या पूर्वाग्रह के एक-दूसरे से जुड़ते, जिससे एक अधिक समृद्ध और विविध समाज का निर्माण होता।
आज भी प्रासंगिक अशोक
पैट्रिक ओलिवेल की यह पुस्तक हमें केवल इतिहास को देखने का एक नया दृष्टिकोण ही नहीं देती, बल्कि आधुनिक दुनिया में शांति, सहिष्णुता और सद्भाव की तलाश में अशोक के सिद्धांतों की प्रासंगिकता पर भी विचार करने के लिए प्रेरित करती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि एक दार्शनिक राजा की दूरदर्शिता, यदि पूरी तरह से साकार होती, तो मानव सभ्यता का मार्ग कितना भिन्न हो सकता था।
यह पुस्तक उन सभी के लिए एक आवश्यक पठन है जो इतिहास, दर्शन और मानवीय संभावनाओं में रुचि रखते हैं।


