अरुंधति रॉय: गाजा से मोदी सरकार तक, भारत की विदेश नीति पर तीखी आलोचना

जानी-मानी भारतीय लेखिका और कार्यकर्ता, अरुंधति रॉय, अपने बेबाक विचारों और तीखी आलोचनाओं के लिए जानी जाती हैं। हाल ही में उन्होंने अपने एक बयान में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और भारत की विदेश नीति पर गंभीर सवाल उठाए, जिसने एक बार फिर बहस छेड़ दी है।

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अरुंधति रॉय की बेबाकी: गाजा और तेहरान

रॉय ने गाजा और तेहरान के बीच एक सीधा संबंध स्थापित करते हुए, संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल पर “शहरों पर कालीन बमबारी” (carpet bombing cities) का आरोप लगाया। उन्होंने इन कार्रवाइयों को अमानवीय और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया। उनकी यह टिप्पणी वैश्विक मंच पर चल रहे संघर्षों और पश्चिमी शक्तियों की भूमिका पर गहरे सवाल खड़े करती है। रॉय अक्सर अपनी लेखन और वक्तव्यों के माध्यम से शक्ति के दुरुपयोग, साम्राज्यवाद और मानवाधिकारों के हनन जैसे मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करती रही हैं।

भारत की विदेश नीति पर तीखी आलोचना: ‘ऐतिहासिक गरिमा’ का प्रश्न

अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर अपनी बात रखते हुए, अरुंधति रॉय ने भारत सरकार, विशेष रूप से मोदी सरकार की विदेश नीति की भी कड़ी निंदा की। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विदेशी शक्तियों के सामने “विनम्रतापूर्वक झुक रही है” (groveling) और भारत की ऐतिहासिक गरिमा को त्याग रही है।

रॉय के अनुसार, भारत ने अतीत में हमेशा एक स्वतंत्र और गुटनिरपेक्ष विदेश नीति का पालन किया है, जहाँ उसने किसी भी बड़ी शक्ति के आगे झुकने से इनकार किया। उन्होंने वर्तमान सरकार पर आरोप लगाया कि वह इस ऐतिहासिक विरासत से भटक रही है और अपने राष्ट्रीय हितों के बजाय विदेशी शक्तियों के एजेंडे को प्राथमिकता दे रही है। यह आरोप भारत के उन सिद्धांतों पर सवाल उठाता है, जो दशकों से उसकी विदेश नीति का आधार रहे हैं – जैसे कि संप्रभुता, आत्मनिर्भरता और वैश्विक न्याय का समर्थन।

अरुंधति रॉय की आलोचना का महत्व

अरुंधति रॉय की टिप्पणियां केवल एक राजनीतिक बयान से कहीं अधिक हैं; वे अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता, मानवाधिकार और एक राष्ट्र की आत्म-पहचान पर एक गहन विमर्श को प्रेरित करती हैं। उनकी आलोचना समाज को उन महत्वपूर्ण सवालों पर सोचने पर मजबूर करती है कि एक राष्ट्र को वैश्विक मंच पर किस तरह व्यवहार करना चाहिए और उसे अपनी नैतिक स्थिति और ऐतिहासिक मूल्यों को कैसे बनाए रखना चाहिए। उनके विचार अक्सर विवादास्पद होते हैं, लेकिन वे सार्वजनिक विमर्श के लिए महत्वपूर्ण बिन्दु प्रदान करते हैं, खासकर ऐसे समय में जब भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।

यह महत्वपूर्ण है कि हम इन आलोचनाओं को एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज के भीतर होने वाली स्वस्थ बहस के हिस्से के रूप में देखें, जहाँ विभिन्न दृष्टिकोणों को सुना और समझा जाता है।

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