भीष्म साहनी की ‘तमस’: हिंसा और दिखावटी शांति के दौर में आज भी प्रासंगिक

साहित्य प्रेमियों के लिए कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जिन्हें बार-बार पढ़ने पर भी उनकी गहराई और प्रासंगिकता कम नहीं होती। भीष्म साहनी का कालजयी उपन्यास ‘तमस’ ऐसी ही एक रचना है। बंटवारे की त्रासदी पर आधारित यह उपन्यास आज भी उतना ही समकालीन और विचारोत्तेजक लगता है, जितना अपने प्रकाशन के समय था। एक साहित्यप्रेमी के तौर पर, जब मैंने हाल ही में ‘तमस’ को दोबारा पढ़ा, तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि हिंसा, नफरत और दिखावटी शांति समितियों के हमारे मौजूदा दौर में इसकी गूंज कितनी स्पष्ट सुनाई देती है।

‘तमस’ क्या है? एक क्रूर यथार्थ का दर्पण

‘तमस’ विभाजन के उस भयावह काल को दर्शाता है, जब मानवीयता और भाईचारा सबसे गहरे संकट में थे। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना का वर्णन नहीं करता, बल्कि उन जटिल सामाजिक-राजनीतिक शक्तियों को उजागर करता है, जो लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करती हैं। भीष्म साहनी ने बड़ी संवेदनशीलता और यथार्थवाद के साथ दिखाया है कि कैसे अफवाहें, भय और स्वार्थी राजनीतिक एजेंडे साधारण लोगों को किस तरह उन्माद की खाई में धकेल देते हैं। उपन्यास का केंद्रीय विचार यह है कि हिंसा, चाहे किसी भी रूप में हो, अंततः मानवता को ही तबाह करती है।

हिंसा और नफरत का अंतहीन चक्र

उपन्यास के पात्र और उनकी परिस्थितियां आज भी हमें अपने आसपास के माहौल में दिखाई देती हैं। चाहे वह छोटी-छोटी बातों पर भड़कने वाली सांप्रदायिक हिंसा हो, या सोशल मीडिया पर फैलाई जाने वाली नफरत, ‘तमस’ हमें याद दिलाता है कि मानव स्वभाव में छिपी यह प्रवृत्ति कितनी खतरनाक हो सकती है। यह दिखाता है कि कैसे एक छोटी सी चिंगारी बड़े दावानल में बदल सकती है, और कैसे सत्ता के भूखे लोग इस आग को हवा देते हैं।

‘दिखावटी शांति समितियां’ और आज की सच्चाई

उपन्यास में ‘शांति समितियों’ का जिक्र आता है, जो अक्सर संकट के समय बनाई जाती हैं। साहनी बहुत ही तीखे ढंग से इन समितियों की निरर्थकता और पाखंड को उजागर करते हैं। ये समितियां अक्सर समस्या का मूल समाधान करने के बजाय, केवल दिखावा करती हैं और सत्ता के समीकरणों को साधने का काम करती हैं। क्या आज भी हम ऐसी ही ‘शांति’ की घोषणाएं नहीं सुनते, जो जमीन पर कोई ठोस बदलाव नहीं ला पातीं? क्या हम आज भी ऐसे ‘नेताओं’ को नहीं देखते, जो एक तरफ शांति की बात करते हैं और दूसरी तरफ नफरत की आग भड़काते हैं?

क्यों ‘तमस’ आज भी प्रासंगिक है?

  • मानव स्वभाव का विश्लेषण: यह उपन्यास बताता है कि कैसे भय, अज्ञानता और पूर्वाग्रह किसी भी समाज को अंदर से खोखला कर सकते हैं।
  • सत्ता की भूख और विभाजन: ‘तमस’ स्पष्ट करता है कि कैसे राजनीतिक लाभ के लिए धर्म और जाति के नाम पर लोगों को बांटा जाता है।
  • शांति की वास्तविक कीमत: यह हमें सिखाता है कि सच्ची शांति केवल तभी स्थापित हो सकती है जब हम अपने भीतर के पूर्वाग्रहों और नफरत का सामना करें, न कि केवल बाहरी तौर पर ‘शांति’ का नाटक करें।
  • साहित्य की शक्ति: यह उपन्यास हमें साहित्य की उस शक्ति का एहसास कराता है जो हमें अतीत की गलतियों से सीखने और वर्तमान को समझने में मदद करती है।

निष्कर्ष: ‘तमस’ एक चेतावनी और एक आह्वान

भीष्म साहनी का ‘तमस’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यह हमें याद दिलाता है कि इतिहास खुद को दोहरा सकता है यदि हम इससे सबक न सीखें। आज जब दुनिया भर में और हमारे अपने देश में भी हिंसा, विभाजन और असहिष्णुता बढ़ रही है, ‘तमस’ को पढ़ना एक आईने में देखने जैसा है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वास्तव में शांति चाहते हैं, या केवल ‘शांति’ का एक रस्म निभा रहे हैं। इस उपन्यास का पुनरावलोकन हमें मानवीयता, सहिष्णुता और वास्तविक शांति के मूल्यों को फिर से स्थापित करने का आह्वान करता है।

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