मध्य भारत में आदिवासी इतिहास की अनसुनी कहानियाँ: ‘Threads of Indigeneity’ का विमोचन

मध्य भारत के आदिवासी समुदायों के इतिहास को अक्सर मुख्यधारा के विमर्श में उचित स्थान नहीं मिल पाता। इसी खाई को पाटने का महत्वपूर्ण कार्य जोसेफ बारा (Joseph Bara) और अंजना सिंह (Anjana Singh) द्वारा संपादित संकलन ‘Threads of Indigeneity in Central India’ करता है। यह पुस्तक आदिवासी इतिहास लेखन (Adivasi Historiography) में मौजूद ‘चुप्पी’ को उजागर करती है और इन समुदायों की समृद्ध विरासत व संघर्षों को सामने लाती है।

आदिवासी इतिहास लेखन में ‘चुप्पी’ का क्या अर्थ है?

इतिहास लेखन में ‘चुप्पी’ का अर्थ केवल जानकारी की कमी नहीं है, बल्कि यह उन दृष्टिकोणों, अनुभवों और संघर्षों का अभाव है जिन्हें जानबूझकर या अनजाने में अनदेखा किया गया है। सदियों से, आदिवासी समुदायों का इतिहास, उनकी संस्कृति, उनके नायकों और उनके प्रतिरोध को अक्सर गैर-आदिवासी परिप्रेक्ष्य से देखा गया है या पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दिया गया है। यह ‘चुप्पी’ उनकी पहचान, स्वायत्तता और उनके अस्तित्व के संघर्ष को समझने में बाधा डालती है।

जोसेफ बारा और अंजना सिंह का यह संकलन ‘Threads of Indigeneity in Central India’ इस ‘चुप्पी’ को तोड़ने का एक सशक्त प्रयास है। यह विभिन्न विद्वानों के लेखों को एक साथ लाता है जो मध्य भारत के आदिवासी समुदायों के जीवन, उनकी लोककथाओं, उनके राजनीतिक आंदोलनों, और उनके पर्यावरण के साथ गहरे संबंध को दर्शाते हैं। पुस्तक इन समुदायों की आवाज़ों को केंद्र में लाती है, जिससे इतिहास की एक अधिक समावेशी और प्रामाणिक समझ विकसित होती है। यह पुस्तक न केवल अकादमिक जगत के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि उन सभी के लिए आवश्यक है जो भारत के विविध सांस्कृतिक ताने-बाने को गहराई से समझना चाहते हैं।

‘Threads of Indigeneity in Central India’ एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है जो हमें आदिवासी इतिहास को नए सिरे से देखने और उनकी अनकही कहानियों को सुनने के लिए प्रेरित करता है। यह हमें यह भी याद दिलाता है कि इतिहास केवल शासकों या प्रमुख संस्कृतियों का नहीं होता, बल्कि हर उस समुदाय का होता है जिसने इस भूमि को आकार दिया है।

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