आज जब भारत और दुनिया पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण उत्पन्न ऊर्जा संकट का सामना कर रहे हैं, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेल के महत्व को समझना और भी महत्वपूर्ण हो गया है। इस संदर्भ में, ललेह खलीली (Laleh Khalili) की प्रभावशाली पुस्तक ‘एक्सट्रैक्टिव कैपिटलिज्म’ (Extractive Capitalism) एक अमूल्य दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है कि आखिर क्यों तेल आज भी वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवनधारा बना हुआ है।
तेल की भूमिका और भू-राजनीति
खलीली अपनी पुस्तक में निष्कर्षण पूंजीवाद (Extractive Capitalism) के गहरे तंत्रों का विश्लेषण करती हैं, जो हमें यह समझने में मदद करता है कि किस प्रकार तेल, एक प्राकृतिक संसाधन होने के बावजूद, भू-राजनीति, शक्ति संबंधों और वैश्विक व्यापार के केंद्र में आ गया है। उनका कार्य सिर्फ तेल निष्कर्षण की प्रक्रिया पर ही केंद्रित नहीं है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे इसके इर्द-गिर्द एक जटिल आर्थिक और राजनीतिक ढाँचा बुना गया है, जो संकटों के बावजूद इसकी केंद्रीयता को बनाए रखता है।
क्यों है यह पुस्तक आवश्यक?
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक अनिवार्य पठन है जो वर्तमान ऊर्जा संकट के मूल कारणों को समझना चाहते हैं और यह जानना चाहते हैं कि क्यों भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भी तेल की मांग और उसकी रणनीतिक अहमियत कम नहीं होती। ललेह खलीली का विश्लेषण हमें वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य की जटिलताओं को समझने के लिए एक सशक्त बौद्धिक उपकरण प्रदान करता है। ‘एक्सट्रैक्टिव कैपिटलिज्म’ हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे संसाधनों का निष्कर्षण न केवल आर्थिक गतिविधियों को आकार देता है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करता है, जिससे तेल की भूमिका लगातार बनी रहती है।


